हम आज की आवाज हैं


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हम वो हैं जो कभी पदमावती के नाम पे,
स्कूली बच्जों के बसों पर पत्थर मारते हैं।
और हम वो भी हैं जो सौ रूपये कि खातिर,
भ्रष्ट नेताओं के संग मुल्क बेचते हैं।
कोई हमे वामपंथी कहता तो कोई कहे फासीवाद है,
हाँ!शायद हम आज की ही आवाज़ हैं।

हमने ही घाटीयों मे पंडितों को मारा था,
और हमने ही रेलगाड़ी के डिब्बे जलाये थे।
फिर हमारे जटावों से गंगा निकली,
और हमारे भुजाओं से ही कत्लेआम मचा।
कोई कहता कट्टरपंथ है तो कोई कहे राष्ट्रवाद है,
हाँ!शायद हम आज की ही आवाज़ हैं।

हमने ही कभी आदीवासीयों को बेघर कर दिया,
फिर हम ही नकसल बनकर बनदूकें चलाई।
पर जाने मुल्क के किस मुहब्बत ने,
हमे उन शहीदों के मजार पे पहुंचा दिया।
जिनकी शहादत के हम आज भी कर्जदार हैं,
हाँ! हम उन शहीदों की भी एक आवाज हैं।

द्वारा : निलेश रंजन

बीता हुआ पल!!


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काश! फूलों सी कहानी होती हम इंसानो की भी कभी,

तो टूटकर, पत्थर पे चढ़ने का गम ना होता!

काश! नदियों सी रवानी होती मुझमे भी कभी,

तो तेरा साथ छूटने पे आँखें कभी नम ना होती!

ये तो अजीब इत्तेफाक-ए-इश्क़ था, जो मेरा जुनूं भी छला गया!

वरना तेरे हाथों की लकीरों पे मेरी ही वफ़ादारी लिखी होती!!

खैर! अब तो हर दिन की रह जायेगी ये बेवफ़ाई,

क्यूंकी मैं अब भी तेरा ही बीता हुआ एक छोटा सा पल हूँ! 

द्वारा: नीलेश रंजन

 

 

कुछ यूँ सा हुआ था कभी अंत मेरा!!


mitti ka chulha

जब सुन्दर सा कोयले का धुंआ,
उठा करती थी मिटटी के चूल्हों से!!
जब जाड़े की ठंडी ठंडी धुप में,
भंवर बैठा करते थे गेंदे के फूलों पे!!
तब रात गुजरती थी कभी लिपटे किसी शाल में,
और तब मैं लेटा था दिल्ली के किसी अस्पताल में!!

जब दोस्त तमाशा करते थे कुछ छोटी से बातों पे,
और मेरे तन को सीला गया कुछ मोटे से टांको से!
जब डरते थे सब भूतों से या फिर कोने के बन्दर से ,
और मैं लड़ पड़ा अकेले ही छुपे दर्द के समंदर से!!
आये न कोई पीर सामने न आया कोई संत बड़ा,
कुछ यूँ सा हो गया था कभी अंत मेरा!!

By : Nilesh Ranjan

एक ऐसा भी था बचपन!!


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एक दिन वो मासूम सा रात कुछ याद आ गया,
वो फलक तक चाँद को देखना और मुस्कुराना!
वो सीढ़ियों पे दोस्तों से बैठकर बातें करना,
और छत से लगे वृक्ष से मीठे अमरुद तोड़ना!!

वो पतंगों से भरा आसमान और धागे पे चढ़ा मांझा,
साइकिल चलाती हर हीर के पीछे होता था एक रांझा!
गणित के क्लास में उसका मुड़कर मुझे देखना,
और नज़रें मिलते ही मुझसे नज़रें चुराना!!

वो लैंप की धीमी रौशनी में,
उसके लिखे नोट्स को पढ़ना!
और सिर्फ उसके एक मुस्कराहट पे,
दोस्तों को चाय समोसा की पार्टी देना!!

छत पे पड़ी बेंच पे लेट कर उसके बारे में सोचना,
वो फलक तक चाँद को देखना और मुस्कुराना!
सुबह स्कूल जल्दी पहुँच कर उसकी राह देखना,
और उसके आते ही दिल की धड़कनो का बढ़ जाना!!

चाँद तॊ आज भी फलक पे है,
पर न रात में मासूमियत है और न मुस्कराहट!
कुछ बेबस सी खुशियाँ है बस,
पर न किसी का इंतज़ार है और न किसी की है आहट!!

लेखक : नीलेश रंजन

सैलाब!!


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देखो! आखिर आ ही गया सैलाब,
ना कोई इंद्र की कृपा और ना कोई वायु का दाब!
कितनो ने ले ली है जल समाधि,
जो बचे हैं, उनमे है बाकी जान आधी!!

अब ना कोई सहारा है और ना कोई मसीहा,
ना कोई उम्मीद की रौशनी और ना कोई दिया!
अब किससे कहोगे तुम अपनी आपबीती,
वो आएंगे और फिर चलेगी तुम्हारी लाशों पर भी राजनीति!!

जाकर लाओ उन् मसीहाओं को,
जिन्होंने भ्रमित किया है तुम्हारी दिशाओं को!
मांगो जवाब अपने हक़ का,
और मांगो जवाब अपनी बदकिस्मती का!!

तुम्हारे संग आंसू बहकर,
वो पिएंगे शराब!
अपने अरमानो के संग डूबते,
तुम झेलोगे सैलाब!!

अब तो आँखें खोलो मेरे भाई!
कब तक टूटते बाँध देखोगे,
कब तक देखोगे उजरते घर?
कब तक सुनोगे झूठे वादे,
और कब तक बचाओगे डूबते घर?

आँखों की काली पट्टी को खोलो,
और गले से जाती की जंजीर को तोड़ो!
और तब भी आँखें ना खुल पाये,
तो देखना फिर से आएगा सैलाब!!

लेखक : नीलेश रंजन