कुछ यूँ सा हुआ था कभी अंत मेरा!!


mitti ka chulha

जब सुन्दर सा कोयले का धुंआ,
उठा करती थी मिटटी के चूल्हों से!!
जब जाड़े की ठंडी ठंडी धुप में,
भंवर बैठा करते थे गेंदे के फूलों पे!!
तब रात गुजरती थी कभी लिपटे किसी शाल में,
और तब मैं लेटा था दिल्ली के किसी अस्पताल में!!

जब दोस्त तमाशा करते थे कुछ छोटी से बातों पे,
और मेरे तन को सीला गया कुछ मोटे से टांको से!
जब डरते थे सब भूतों से या फिर कोने के बन्दर से ,
और मैं लड़ पड़ा अकेले ही छुपे दर्द के समंदर से!!
आये न कोई पीर सामने न आया कोई संत बड़ा,
कुछ यूँ सा हो गया था कभी अंत मेरा!!

By : Nilesh Ranjan