एक ऐसा भी था बचपन!!


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एक दिन वो मासूम सा रात कुछ याद आ गया,
वो फलक तक चाँद को देखना और मुस्कुराना!
वो सीढ़ियों पे दोस्तों से बैठकर बातें करना,
और छत से लगे वृक्ष से मीठे अमरुद तोड़ना!!

वो पतंगों से भरा आसमान और धागे पे चढ़ा मांझा,
साइकिल चलाती हर हीर के पीछे होता था एक रांझा!
गणित के क्लास में उसका मुड़कर मुझे देखना,
और नज़रें मिलते ही मुझसे नज़रें चुराना!!

वो लैंप की धीमी रौशनी में,
उसके लिखे नोट्स को पढ़ना!
और सिर्फ उसके एक मुस्कराहट पे,
दोस्तों को चाय समोसा की पार्टी देना!!

छत पे पड़ी बेंच पे लेट कर उसके बारे में सोचना,
वो फलक तक चाँद को देखना और मुस्कुराना!
सुबह स्कूल जल्दी पहुँच कर उसकी राह देखना,
और उसके आते ही दिल की धड़कनो का बढ़ जाना!!

चाँद तॊ आज भी फलक पे है,
पर न रात में मासूमियत है और न मुस्कराहट!
कुछ बेबस सी खुशियाँ है बस,
पर न किसी का इंतज़ार है और न किसी की है आहट!!

लेखक : नीलेश रंजन